धर्म और मानव गरिमा की रक्षा का शाश्वत प्रतीक है गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान

अंशुल त्यागी, धर्म, स्वतंत्रता, मानव गरिमा और भारतीय सांस्कृतिक चेतना की रक्षा हेतु अपने प्राणों का उत्सर्ग करने वाले हिन्द की चादर – श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें बलिदान दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, गाजियाबाद महानगर द्वारा एक गरिमामय एवं वैचारिक गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम इतिहास-स्मरण के साथ-साथ राष्ट्रबोध और सांस्कृतिक चेतना को जागृत करने का सशक्त माध्यम बना।

शब्द कीर्तन से हुआ कार्यक्रम का शुभारंभ

कार्यक्रम का शुभारंभ गुरुद्वारे से पधारे रागी जत्थे द्वारा शब्द कीर्तन के साथ हुआ। कीर्तन ने उपस्थित जनसमूह को गुरु परम्परा, त्याग, साधना और आत्मबल की आध्यात्मिक भावभूमि से जोड़ा।

बलिदान दिवस का उद्देश्य – इतिहास को जीवन में उतारना

गोष्ठी में मुख्य वक्ता के रूप में श्री रविन्द्र सिंह जी (प्रोफेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय) ने अपने उद्बोधन में कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा बलिदान दिवस मनाने का उद्देश्य केवल इतिहास को स्मरण करना नहीं, बल्कि उस त्याग परम्परा को वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों के जीवन में जीवंत करना है।

उन्होंने कहा कि श्री गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान सम्पूर्ण मानवता की धार्मिक स्वतंत्रता, आत्मसम्मान और सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा के लिए था, जो भारतीय राष्ट्रचेतना का मूल आधार है।

धार्मिक स्वतंत्रता के लिए दिया गया विश्वविरल बलिदान

श्री रविन्द्र सिंह जी ने ऐतिहासिक संदर्भ प्रस्तुत करते हुए बताया कि औरंगजेब की जबरन धर्मांतरण की नीतियों के विरोध में गुरु तेग बहादुर जी ने निर्भीक होकर कश्मीरी पंडितों की रक्षा का दायित्व अपने कंधों पर लिया।
इसी संघर्ष के परिणामस्वरूप सन् 1675 में दिल्ली में उनका बलिदान हुआ, जो धार्मिक स्वतंत्रता, वैचारिक स्वाधीनता और मानवीय मूल्यों की रक्षा का विश्वविरल उदाहरण है।

उन्होंने गुरु साहिब के संदेश को रेखांकित करते हुए कहा—

धर्म परिवर्तन के दबाव के सामने झुकने के बजाय सत्य, आत्मसम्मान और मानव अधिकारों की रक्षा के लिए बलिदान स्वीकार करना ही सच्चा धर्म है।

भारत की आत्मा का प्रतीक है गुरु तेग बहादुर जी का जीवन

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सरदार मलकीत सिंह जस्सर जी ने कहा कि श्री गुरु तेग बहादुर जी का जीवन और शहादत भारत की आत्मा—सहिष्णुता, साहस और समरसता—का सजीव प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि संघ द्वारा ऐसे बलिदान दिवस समाज को त्याग, कर्तव्यबोध, राष्ट्रनिष्ठा और सामाजिक एकता का संदेश देने हेतु आयोजित किए जाते हैं।

गुरुद्वारा समितियों की सक्रिय सहभागिता

कार्यक्रम में विभिन्न गुरुद्वारा समितियों के पदाधिकारियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही, जिनमें—

  • श्री हरमीत सिंह जी (अध्यक्ष, बजरिया गुरुद्वारा)
  • श्री जगमोहन जी (प्रधान, गांधी नगर गुरुद्वारा)
  • सरदार रविंद्र सिंह जी (प्रधान, कवि नगर गुरुद्वारा)

सभी ने गुरु साहिब के आदर्शों को सामाजिक जीवन में आत्मसात करने तथा राष्ट्र की एकता और सांस्कृतिक अखंडता के लिए सतत प्रयास करने का संकल्प व्यक्त किया।

राष्ट्रस्मृति को जागृत रखने का संकल्प

कार्यक्रम के माध्यम से यह स्पष्ट संदेश दिया गया कि बलिदान दिवस मनाना राष्ट्र की स्मृति को जागृत रखना है, ताकि समाज यह समझ सके कि आज की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वाधीनता और सामाजिक सौहार्द असंख्य महापुरुषों के त्याग का परिणाम है।

कार्यक्रम का समापन राष्ट्रबोध, सांस्कृतिक समरसता और सामाजिक एकता के भाव के साथ हुआ।

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