अंशुल त्यागी, रेटिंग: ⭐⭐⭐⭐☆ (4/5)
अगर आप ऐसी फिल्म की तलाश में हैं जो पूरे परिवार के साथ बैठकर देखी जा सके, हंसी भी दे और अंत में एक अच्छा संदेश भी छोड़ जाए, तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ आपके लिए बेहतरीन विकल्प साबित हो सकती है। निर्देशक रविंदर सिवाच की यह फिल्म हल्के-फुल्के अंदाज में कर्म और किस्मत के बीच चलने वाली बहस को पेश करती है और दर्शकों को सोचने पर भी मजबूर करती है।
फिल्म का निर्माण संदीप कपूर और प्रिया कपूर ने प्रोमोडोम मोशन पिक्चर्स के बैनर तले किया है। कहानी संदीप कपूर की है, जबकि लेखन और निर्देशन की जिम्मेदारी रविंदर सिवाच ने संभाली है।
कहानी
फिल्म की कहानी प्रोफेसर साई राम टुटेजा (अन्नू कपूर) के इर्द-गिर्द घूमती है। पेशे से वह फिजिक्स के प्रोफेसर हैं, लेकिन निजी जिंदगी में वास्तु और अंधविश्वास पर उनका अटूट विश्वास है। विज्ञान पढ़ाने वाला व्यक्ति जब खुद अंधविश्वास के जाल में उलझा हो, तो यही विरोधाभास कहानी को दिलचस्प बना देता है।
कहानी तब नया मोड़ लेती है जब प्रोफेसर अपने परिवार के लिए एक ऐसा घर चुनते हैं जिसे वे वास्तु के हिसाब से बिल्कुल सही मानते हैं। लेकिन एक अप्रत्याशित घटना उनके विश्वास की नींव हिला देती है। इसके बाद शुरू होती है आत्ममंथन, रिश्तों और जीवन के असली मायनों को समझने की यात्रा।
अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टार कास्ट है। अन्नू कपूर अपने शानदार अभिनय से पूरी फिल्म को मजबूती देते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग जितनी शानदार है, उतनी ही प्रभावशाली उनकी भावनात्मक परफॉर्मेंस भी है।
पवन मल्होत्रा, रुखसार रहमान, बृजेंद्र काला, जीवेशु अहलूवालिया, राजेंद्र सेठी, समिट गुलाटी और नितिन अरोड़ा ने भी अपने-अपने किरदारों को पूरी ईमानदारी से निभाया है। सभी कलाकार कहानी को वास्तविक और मनोरंजक बनाने में सफल रहते हैं।

निर्देशन और तकनीकी पक्ष
रविंदर सिवाच का निर्देशन संतुलित और सधा हुआ नजर आता है। फिल्म कहीं भी जरूरत से ज्यादा भारी नहीं लगती और अपनी सरल कहानी के बावजूद दर्शकों को अंत तक जोड़े रखती है। दिल्ली के मध्यवर्गीय परिवारों का माहौल बेहद वास्तविक तरीके से दिखाया गया है, जिससे कहानी और भी करीब महसूस होती है।
फिल्म के संवाद हल्के-फुल्के, मजेदार और कई जगह प्रभावशाली हैं। वहीं बैकग्राउंड स्कोर कॉमेडी और इमोशनल दृश्यों दोनों को बेहतर बनाने में मदद करता है।
क्या हो सकता था बेहतर?
फिल्म का दूसरा भाग पहले हिस्से की तुलना में थोड़ा धीमा महसूस होता है। कुछ सहायक किरदारों को अगर थोड़ा और स्क्रीन टाइम और गहराई मिलती तो कहानी का असर और बढ़ सकता था। हालांकि ये कमियां फिल्म के मनोरंजन पर ज्यादा असर नहीं डालतीं।
अंतिम फैसला
‘उत्तर दा पुत्तर’ एक ऐसी फैमिली फिल्म है जो बिना किसी फालतू शोर-शराबे के दर्शकों का मनोरंजन करती है। यह हंसाती भी है, भावुक भी करती है और आखिर में यह सोचने पर मजबूर करती है कि जिंदगी में किस्मत से ज्यादा अहमियत हमारे कर्म की होती है।
अगर आप साफ-सुथरी, हल्की-फुल्की और संदेश देने वाली पारिवारिक फिल्में पसंद करते हैं, तो ‘उत्तर दा पुत्तर’ इस सप्ताह आपकी वॉचलिस्ट में जरूर होनी चाहिए।