डिम्पल भारद्वाज ।। आपने कई ऐसे खिलाड़ियों की कहानी सुनी होगी। जिनका बचपन गरीबी मे बीता। और उन खिलाड़ियों ने बड़ी मेहनत और लगन के दम पर काबालियत हासिल करके दुनिया को ये बता दिया था कि अगर इंसान के अंदर मेहनत और लगन की धुन हो तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता। सिराज के पिता रिक्शा चलाते थे। सिराज ने नाम रोशन किया। जड़ेजा के पिता गार्ड थे। आज जड़ेजा टीम इंडिया के सबसे धूरंधर खिलाड़ी हैं। हार्दिक का बचन भी मुफलिसी में बीता। लेकिन आज दुनिया हार्दिक को सलाम करती है। लेकिन ये क्रिकेटर इन खिलाड़ियों से भी ज्यादा गरीब है। ये भट्टे पर ईंट पाथता है। और जब वक्त मिलता है तो खेलने के लिए चला जाता था।

जी हां ये कहानी है उत्तर प्रदेश के शामली के रहने वाले कुलदीप की, कुलदीप को कहीं काम नहीं मिला। तो ईंट पाथने वाले भट्टे पर काम करने लगे। बमुश्किल से दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो पाता था। मां का कहना था कि भट्टे पर काम करते रहो। दो वक्त की रोटी मिलती रहेगी।लेकिन कुलदीप को कामयाबी मिली तो हर कोई खुश है । कुलदीप की इस कामयाबी के पीछे उनके कोच का भी बहुत बड़ा रोल है। भट्टे पर काम करके जैसे ही वक्त मिलता कुलदीप पास के ही एक ग्राउंड में चला जाता। और जमकर भूके पेट पसीना बहाता। कुछ साल पहले कुलदीप ने जब एकेडमी में एडमिशन लिया था। तो पिता की मौत हो गई। दुखों का पहाड कुलदीप के उपर टूट गया। घर में कमाने की जिम्मेदारी आ गई। एकेडमी में देने के लिए पैसों का इतजाम नहीं हो रहा था। लेकिन कुलदीप के कोच को ये पता था। कि अगर आज इस लड़के की मदद कर दी। तो आने वाले वक्त में ये लड़का बुमराह जैसा बन सकता है। इसलिए कोच ने कुलदीप को फ्री में कोचिंग देना शुरु कर दिया।

कुलदीप की मेहनत का नतीजा जब सामने आया। तो हर तरफ खुश है। कुलदीप की मेहनत और काबिलियत को देखते हुए उत्तर प्रदेश क्रिकेट एसोशिएशन ने कुलदीप को टीम में जगह दी है। आज कुलदीप और उसका परिवार भावुक है। मां का कहना है कि ये बेटे की मेहनत का नतीजा है।कुलदीप की सफलता को लेकर हर कोई खुश है, लेकिन कुलदीप को अभी भी ये फिक्र है कि अगर खेलेगा तो भट्टे पर कैसे जाएगा। भट्टे पर नहीं जाएगा तो पैट कैसे भरेगा।