खेल समाचार

अरे गामा पहलवान हो क्या…!

नेहा राठौर
उन्नीस सौ साठ की बात है.. लाहौर के एक साधारण से घर में कोई मरणासन्न देह पड़ी हुई थी। बदन हड्डियों का ढांचा भर था।‌ चील जैसी आंखें कोटरों में धंस गयी थी। शरीर पर यहां-वहां मक्खियां भिनभिना रही थीं और वह व्यक्ति उन मक्खियों को उड़ाने में असमर्थ था।‌ब्रिटेन का एक पत्रकार यह सब देख रहा था। बिस्तर पर लेटे उस व्यक्ति ने बुदबुदाते हुए कहा;भारत छोड़ कर पाकिस्तान आना बहुत बड़ी गलती थी ! वह व्यक्ति रुस्तमे जमां गामा था। जिसका नाम लिखते हुए मैं लोमहर्षक भाव से भर उठता हूं। मुझे आज भी यह स्वीकारने में कोई अफसोस नहीं होता‌ कि बचपन में जिन चंद ऐतिहासिक लोगों ने मुझे विस्मय से भरा था, उनमें एक नाम इस अपराजेय महामल्ल का भी था। ध्यातव्य है कि विभाजन के बाद पाकिस्तान में रहते हुए गामा को जीविकोपार्जन के लिए अपनी सात गदाएं बेचनी पड़ी थीं जो उसने भारत में रहते हुए बड़ी कुश्तियों में विजयी होने पर पुरस्कार स्वरूप प्राप्त की थीं। लगभग बयासी साल की उम्र में घोर शारीरिक कष्ट और विपन्नता को भोगते हुए विश्व के महानतम मल्लयोद्धा ने आखिरी सांस ली थी । गामा के आखिरी दिनों की तस्वीर इतनी खराब है कि उसे लगाने की इच्छा नहीं होती इसलिए उसके स्वर्णिम अतीत का छायाचित्र टांका है–जिसमें वह अपराजेय, वज्रांग, गर्वीला नायक सा दीख रहा ।

गामा पहलवान

सन चौरासी का वर्ष रहा होगा। कादंबिनी पत्रिका का एक अंक पलट रहा था। अचानक एक पन्ने पर उभरे शीर्षक पर रुक गया–रुस्तमे ज़मां गामा । तीन पन्नों के उस आलेख में दूसरे पन्ने पर उसकी तस्वीर थी। मांसपेशियां अवयव सी थी। चकला जैसा सीना था। ताव से तनी मूछों के साथ उसने एक गदा ले रखी थी। कुछ बजरंग बली सी मुद्रा में खड़ा था। मैंने लेख पढ़ना शुरू किया। समाप्त करने के बाद इस विचार से भर उठा कि वह अद्वितीय था। उस आलेख को पढ़ने के बाद ही मुझे इस बात का उत्तर भी मिल गया था‌ कि गांव में लोग पहलवानी और बल का पर्याय गामा को ही क्यों मानते थे।

गामा के जीवन की पहली सबसे आश्चर्यचकित करने वाली घटना तब की है, जब वह दस वर्ष का था। जोधपुर के महाराज ने देश के चार सौ बलिष्ठ मल्लयोद्धाओं को आमंत्रित किया था। वहां मल्ल नहीं होना था-शारीरिक शक्ति और तितिक्षा यानी सहनशक्ति की परीक्षा होनी थी। लगातार दंड पेलना था। कुछ पहलवान तो आधे घंटे में निबट गए । कुछ घंटे डेढ़ घंटे तक खिंच गए। समय के साथ अधिकांश मैदान छोड़ गए । अंत में जब पंद्रह बचे तो उनमें दस वर्ष का गामा भी शामिल था । महाराज ने विजेता का हार उस बालक के गले में डाल दिया। उद्घोषणा के समय गामा निढाल पड़ गया था। बाद में उसे जब होश आया तब उसने पूछे जाने पर कहा था–कितने दंड पेले थे याद नहीं, तकरीबन पांच- छह हजार शायद !

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कुश्ती में गामा का प्रशिक्षण शुरू हो चुका था । पंद्रह वर्ष की उम्र में उसने पंजाब के सभी नामी पहलवानों को धूल चटा दी। साढ़े अठारह साल का होते-होते गामा ने रहीम बख्श सुल्तानी वाला को चुनौती दे डाली। रहीम एक दैत्याकार पहलवान था।‌रुस्तमे हिंद। उसकी लंबाई लगभग सात फुट थी। उस पहाड़ के सामने पांच फुट सात इंच की चट्टानी काया का एक दुस्साहसी डट गया। सुल्तानी वाला मान रहा था कि वह उस लड़के को मिनटों में मसल डालेगा लेकिन घंटों में वह पस्त न हुआ। सुल्तानी वाला की सांसें फूल गयीं। गामा टस से मस न हुआ। भारत ने एक युवा महाभट को उदित होते हुए देखा।अगले दो वर्षों में गामा ने देश के सभी बड़े पहलवानों को आसमान दिखला दिया था। लगभग साठ वर्ष की कुश्ती में पांच हजार दंगल लड़ने वाले गामा की पीठ कभी माटी से नहीं लगायी जा सकी।उसके बैरी और प्रतिकामी दहन लिए उससे बार-बार भिड़ते। हर बार पछाड़ खाकर म्लानमुख अखाड़े से लौटते।

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इंग्लैंड की यात्रा पर जब गामा को लड़ते हुए देखा गया तो एक मशहूर खेल समीक्षक ने टिप्पणी की.. बैल की शक्ति ताकत..बिल्ली सी फूर्ति ! हालांकि इग्लैंड के आयोजकों ने शुरू में भारतीय पहलवानों को लड़ाने से इन्कार कर दिया था। तमतमाए गामा ने चुनौती दी कि वह आधे घंटे में तीन पहलवानों को रिंग से बाहर फेंकेगा। गर ऐसा न कर सका तो पुरस्कार राशि अपनी जेब से चुकाएगा। कुश्ती हुई। गामा अपने अपराजेय़ भाई इमाम बख्श के साथ विजयी होता रहा। यहां उसने स्तानिस्लाव जेबिस्को को दो घंटे तक नीचे दबाए रखा था । बाद में जेबिस्को गामा से लड़ने भारत आया और 42 सेकेंड में चित होकर वापस लौट गया। जॉन बुल बेल्ट जीतने के बाद भारत लौटे गामा और रहीम बख्श सुल्तानी वाला फिर अखाड़े में उतरे । कुश्ती दुबारा अनिर्णीत समाप्त हो गई । गामा ने रहीम बख्श सुल्तानी वाला को चौथी कुश्ती में पराजित किया। तब सुल्तानी वाला की पसलियां टूट गई थीं।

बाद में गामा से जब पूछा गया था कि उसके जीवन में सबसे मुश्किल चुनौती कौन सी थी। गामा ने फौरन रहीम बख्श सुल्तानी वाला का नाम लिया था। गामा जीवन भर अविजित रहा।‌ कुछ वैसा ही कीर्तिमान उसके छोटे भाई इमाम बख्श का भी था.. जो मुश्किल से तीन चार कुश्तियां हारा था। जिनसे हारा था उन्हें बाद में धूल भी चटा डाली थी।

गामा के चार लड़के थे।चारों काल कवलित हो गए। इमाम बख्श के पांच बेटे थे। पांचों विकराल पहलवान हुए।पाकिस्तान में एक समय इस खानदान का डंका बजता था। अब लाहौर के एक कंटीले झाड़ वाले इलाके में अपने समय के दो महाबलियों की कब्रें हैं। गामा और इमाम बख्श दोनों भाई सोते हैं। पाकिस्तान की कुश्ती बर्बादी के राग गाती है। उसे बर्बाद ही होना था। वह तभी तक फलती फूलती रही जब तक वह अखंड भारत में लड़ी जाती थी।उन्नीसवीं शती के मध्य से बीसवीं शती के मध्य तक भारतीय उपमहाद्वीप में कुछ महाबली मल्लयोद्धा हुए थे। जैसे कीकर सिंह…गुलाम पहलवान, रहीम बख़्श सुल्तानी वाला,बिद्दू बिरहमन, गोबर गोहों, सुखदेव, बिट्टा पहलवान, कालिया जलालपुरी, इमाम बख़्श आदि आदि। ये सभी महा- भयंकर योद्धा थे। लेकिन इन सबके बीच गामा द ग्रेट एक दमकता हुआ तारा था। अतुलनीय, अपराजेय, अदृष्टपूर्व। गामा एक किंवदंती है। बंटवारे के बाद उसने पाकिस्तान का चुनाव न किया होता तो कहानी कुछ और रही होती।

मैं बार-बार उस अंधकार के बारे में सोच रहा हूं जो गामा ने अपने अंतिम वर्षों में देखा। हजार किलो का पत्थर उठा लेने वाला महाबली अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में बदन पर बैठी मक्खियां नहीं उड़ा पाता था।

छह बरस पुरानी पोस्ट है। आज कुश्ती पर कुछ सर्च कर रहा था तो सामने आ गई।

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